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चूक या जिम्मेदारो की विफलता : 700 परीक्षार्थियों के भविष्य से खिलवाड़

  

🔴हस्ताक्षर के खेल में चकनाचूर हुआ 700 छात्रो सपने

🔴 सिस्टम की गलती की सजा भुगत रहे है गोस्वामी तुलसीदास इंटर कालेज के सात सौ छात्र 

🔵  ग्लोबल न्यूज 

कुशीनगर। माध्यमिक शिक्षा परिषद द्वारा संचालित बोर्ड परीक्षा से वंचित हुए सात सौ छात्रों का मामला अब केवल आरोप–प्रत्यारोप और विद्यालय के चूक तक सीमित नहीं रहा। पडरौना नगर में स्थित गोस्वामी तुलसीदास इंटर कॉलेज से उठी यह चिंगारी अब पूरे शिक्षा तंत्र की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दी है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हस्ताक्षर किसने किए,सवाल यह है कि सत्यापन की हर सीढ़ी पर बैठे जिम्मेदार आखिर सूरदास क्यो बने रहे थे?सवाल यह भी है कि व्यवस्था ने आंखें क्यों मूंद लीं?

काबिलेगौर है कि संयुक्त शिक्षा निदेशक, गोरखपुर मंडल सतीश सिंह की अगुवाई में चल रही जांच अब दस्तावेजों की श्रृंखला खंगाल रही है। प्रपत्रों की प्रविष्टि, नोडल अनुमोदन, और डीआईओएस स्तर पर अंतिम परीक्षण। यदि किसी एक बिंदु पर भी नियमों से समझौता हुआ है, तो यह केवल विभागीय त्रुटि नहीं, बल्कि जानबूझकर की गयी मनबढई है इतना ही नही किस स्तर पर सत्यापन हुआ, किसने अंतिम अनुमोदन दिया और किस बिंदु पर 700 छात्रों का भविष्य चौपट हो गया। इसकी जबाबदेही विद्यालय के प्रधान लिपिक ज्ञान प्रकाश पाठक, नोडल अधिकारी विकास मणि और जिला विद्यालय निरीक्षक श्रवण कुमार गुप्त की बनती है। छात्रो के भविष्य के साथ किये गये खिलवाड़ की नैतिक जिम्मेदारी इन्हे लेनी होगी। 

🔴 दोषी कौन? नोडल या प्रधान लिपिक 

प्रारंभिक आरोप प्रधान लिपिक पर केंद्रित हैं। नोडल अधिकारी विकास मणि त्रिपाठी के स्थान पर विद्यालय के प्रधान लिपिक ज्ञान प्रकाश पाठक द्वारा हस्ताक्षर किये जाने का मामला सामने आया है। लेकिन क्या 700 छात्रों की परीक्षा प्रक्रिया एक व्यक्ति के भरोसे चलती है? यदि हस्ताक्षर फर्जी थे तो क्या नोडल अधिकारी ने समय रहते आपत्ति दर्ज कराई?

🔴क्या डीआईओएस कार्यालय ने दस्तावेजों का मिलान नहीं किया?

क्या अंतिम स्वीकृति बिना सत्यापन के जारी हो गई?यदि इन प्रश्नों के उत्तर अस्पष्ट हैं, तो मामला सिर्फ एक कर्मचारी तक सीमित नहीं रह जाता बल्कि विद्यालय के प्रधान लिपिक ज्ञान प्रकाश पाठक के साथ नोडल अधिकारी विकास मणि त्रिपाठी व जिला विद्यालय निरीक्षक श्रवण कुमार गुप्त की भी जबाबदेही बराबर की है। 

🔴डीआईओएस कार्यालय की जवाबदेही 

बेशक! जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय की भूमिका अब जांच का केंद्रीय बिंदु बनती जा रही है। परीक्षा से पहले विद्यालयों के प्रपत्रों की जांच और सत्यापन एक नियमित प्रक्रिया है। इसके अलावा परीक्षा प्रक्रिया की निगरानी जिला स्तर पर होती है। ऐसे में 700 छात्रों का मामला अंतिम क्षण तक अनदेखा कैसे रहा? हाल के विवादों के बाद डीआईओएस दफ्तर की विश्वसनीयता पहले से दबाव में थी यह प्रकरण उस दबाव को और गहरा कर रहा है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या यहां जवाबदेही का तंत्र प्रभावी है या केवल औपचारिक?

🔴 छात्रों का भविष्य और विभाग की साख दाव पर

बतादे कि सात सौ परीक्षार्थी सिर्फ संख्या नही, बल्कि वह देश के भविष्य और 700 परिवारों की उम्मीदें हैं। एक शैक्षणिक वर्ष का नुकसान केवल अकादमिक क्षति नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक प्रभाव भी छोड़ता है।

🔴 डीआईओएस कार्यालय पर धमक सकते है जेडी

ऐसी चर्चा है कि उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद के सचिव भगवती सिंह द्वारा संयुक्त शिक्षा निदेशक, गोरखपुर मंडल सतीश सिंह की अगुवाई में प्रकरण की जांच के लिए गठित टीम कभी भी डीआईओएस कार्यालय धमक सकती है। टीम का नेतृत्व कर रहे जेडी स्वयं डीआईओएस दफ्तर पहुंचकर एक एक विन्दुओ की बारीकी से जांच कर व जिम्मेदारो का बयान दर्ज कर अपनी रिपोर्ट सचिव उत्तर प्रदेश को प्रेषित करेगे। इसको लेकर डीआईओएस कार्यालय व गोस्वामी तुलसीदास इंटर कालेज के जिम्मेदारो की चिंता बढ गयी है। 


🔴 सवाल जो यक्ष प्रश्न है

छात्रो के जिन्दगी व भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले दोषियों के विरुद्ध अधिनियम 2024 की धारा 2(च) व धारा 14 के तहत कार्रवाई होगी जिसमे दो वर्ष से लगायत सात वर्ष का कारनामा व जुर्माना का प्राविधान है? क्या प्रभावित छात्रों को विशेष परीक्षा का अवसर मिलेगा?क्या भविष्य में ऐसी घटना रोकने के लिए संरचनात्मक सुधार होंगे? अब देखना दिलचस्प होगा कि जांच रिपोर्ट केवल दोष तय करती है या फिर व्यवस्था को भी आईना दिखाते हुए नजीर बनता है।

🔵 रिपोर्ट - संजय चाणक्य 


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