हर साल पौधरोपण का रिकॉर्ड, फिर भी जंगल गायब, कुशीनगर का हरित खेल
पौधरोपण पर करोड़ों खर्च, जमीनी हकीकत शून्य वृक्षारोपण पर बड़ा सवाल
🔵 ग्लोबल न्यूज
कुशीनगर। जनपद में वन विभाग की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है। कागजों में लाखों पौधे रोपे जाने और हरियाली बढ़ाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है। जंगल सिकुड़ रहे हैं, पौधरोपण योजनाएं दम तोड़ रही हैं और जिम्मेदार अधिकारी धृतराष्ट्र बने बैठे है।
पौधरोपण बना सिर्फ कागजी खेल
गौरतलब है कि हर साल करोड़ों रुपये खर्च कर पौधरोपण अभियान चलाया जाता है, लेकिन अधिकांश पौधे या तो लगाए ही नहीं जाते या फिर विभाग की लापरवाही के कारण कुछ ही दिनों में सूख जाते हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि गड्ढे खोदकर फोटो खिंचवा ली जाती है और बाद में सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। नतीजतन न निगरानी, न रखरखाव, बस फाइलों में हरे-भरे जंगल उगाए जा रहे हैं।
अवैध कटान पर लगाम नहीं
कहना ना होगा कि वन विभाग की सबसे बड़ी नाकामी अवैध कटान रोकने में दिख रही है। रात के अंधेरे में लकड़ी माफिया सक्रिय हैं और कीमती पेड़ों की कटाई धड़ल्ले से हो रही है। कई बार शिकायतों के बावजूद कार्रवाई न होना विभाग की मिलीभगत या लापरवाही की ओर इशारा करता है।
नाम में “जंगल”, ज़मीन पर सन्नाटा
जिले में जंगल बेलवा, जंगल खिरकिया, जंगल जगदीशपुर , जंगल कुरमौल, जंगल बनवीरपुर, जंगल चौरिया, जंगल धर्मपुर,जंगल हनुमानगंज, जंगल अमवा, जंगल शाहपुर, जंगल नाहर छपरा जैसे दर्जनों गांव आज भी अपने नाम में “जंगल” ढो रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इन इलाकों में अब जंगल का नामोनिशान तक नहीं बचा। सवाल यह उठता है जब यहां जंगल ही नहीं, तो ये नाम किस इतिहास की गवाही दे रहे हैं?
नाम क्यों पड़े जंगल ?
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि कभी ये पूरे इलाके घने पेड़ों और प्राकृतिक जंगलों से आच्छादित थे।अंग्रेजी शासन और उससे पहले भी यह क्षेत्र हरित पट्टी के रूप में जाना जाता था। धीरे-धीरे आबादी बढ़ी, खेती फैली और जंगल कटते चले गए बची-खुची जमीन पर भी कब्जे और लापरवाही ने अंतिम चोट कर दी।
अतिक्रमण से सिकुड़ते जंगल
जंगल की जमीन पर कब्जे का खेल भी तेजी से बढ़ रहा है। कहीं खेत बना दिए गए, तो कहीं पक्के निर्माण तक खड़े हो गए। हैरानी की बात यह है कि विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगती या फिर मोटी रकम वसूलकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
बजट खर्च, नतीजा शून्य
सरकार द्वारा वन संरक्षण के लिए हर साल भारी बजट जारी किया जाता है, लेकिन उसका सही उपयोग होता नहीं दिख रहा। न तो जंगलों की सुरक्षा मजबूत हो पा रही है, न ही जैव विविधता बचाने की कोई ठोस पहल नजर आ रही है।
🔵 रिपोर्ट - संजय चाणक्य

No comments: