🔴सिस्टम सोता रहा और रिजवान खुलेआम घूमता रहा, नही लगी पुलिस को भनक
🔵 ग्लोबल न्यूज
कुशीनगर। पडरौना नगर के छावनी राइन मुहल्ला से दबोचे गये रिजवान अहमद की गिरफ्तारी ने स्थानीय पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल व एटीएस के संयुक्त कार्रवाई मे आईएसआईएस से जुड़े रिजवान को गिरफ्तार करके दिल्ली ले जाना इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं स्थानीय स्तर पर निगरानी मे बडी चूक हुई है।
बेशक ! रिजवान अहमद कोई नया नाम नही है। वर्ष 2017 में आतंकी गतिविधियों में संलिप्तता, विस्फोटक बरामदगी और अंतरराष्ट्रीय संपर्क जैसे गंभीर आरोपों मे दोष सिद्ध होने के बाद वह 6 साल तक जेल में रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि जब रिजवान छह वर्षो तक सलाखों के पीछे रहा और वर्ष 2023 में जेल से छूटकर अपने गृह जनपद लौटा, तो क्या स्थानीय पुलिस को इसकी भनक नहीं थी? अगर थी, तो उस पर नजर क्यों नहीं रखी गई?
खुफिया तंत्र फेल या लापरवाही का खेल?
सूत्र बताते हैं कि रिजवान पडरौना में खुलेआम रहता था, वह बकायदे फूड स्टॉल चला रहा था और लोगों के बीच उठता-बैठता था। ऐसे में स्थानीय खुफिया विभाग और स्थानीय पुलिस की भूमिका पर सवाल उठना लाजिमी है। क्या कोई निगरानी तंत्र काम कर रहा था या सब कुछ कागजों तक सीमित था? जगजाहिर है कि कुशीनगर में यह पहला मामला नहीं है जब आतंकी संगठनों से जुड़े संदिग्ध की गिरफ्तारी हुई है। इससे पहले भी ऐसे मामले जिले को कलंकित कर सुर्खिया बटोर चुकी है। बावजूद इसके, न तो कोई ठोस रणनीति दिखी और न ही संदिग्ध गतिविधियों पर कड़ी निगरानी का प्रभाव।
क्या कर रही थी स्थानीय पुलिस ?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पूरी कार्रवाई दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने की। स्थानीय पुलिस सिर्फ सहयोगी की भूमिका में दिखी। यही वजह है कि स्थानीय लोगो के जेहन मे यह सवाल यक्ष प्रश्न बना हुआ है कि क्या कुशीनगर पुलिस को खुद कुछ पता नहीं था?क्या बाहरी एजेंसियों के भरोसे ही जिले की सुरक्षा व्यवस्था चल रही है?
खुफिया तंत्र की जमीनी हकीकत पर सवाल
जिले में खुफिया विभाग की मौजूदगी कागजों में मजबूत दिखती है, लेकिन जमीन पर यह मामला उनकी सक्रियता पर गंभीर सवाल खडा करता है। सबब यह है कि रिजवान अहमद पडरौना मे महीनों से नहीं, बल्कि सालों से रह रहा था, वह बेखौफ फूड स्टॉल संचालित कर रहा था, स्थानीय लोगों के संपर्क में था और बाहर से सामान्य जिंदगी का दिखावा कर रहा था। इसके बावजूद उसकी गतिविधियां स्थानीय पुलिस व एलआईयू विभाग सहित अन्य खुफिया तंत्र के रडार पर नहीं आईं। क्या पुलिस प्रशासन की इनपुट जुटाने की प्रक्रिया कमजोर है? या फिर सूचनाओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा?
अलर्ट के बाद भी नहीं बदली रणनीति
बतादे कि अतीत में भी कुशीनगर जिले में आतंकी संगठनों से जुड़े संदिग्ध पकड़े जा चुके हैं। हर बार कार्रवाई के बाद अलर्ट जारी होता है, मीटिंग होती है, निर्देश दिए जाते हैं। लेकिन जमीनी बदलाव नदारद रहता है।यह “रिएक्टिव पुलिसिंग” का उदाहरण है, जहां घटना के बाद हरकत होती है, पहले नहीं।
लो-प्रोफाइल स्लीपर सेल
कहना न होगा कि रिजवान अहमद की प्रोफाइल चौकाने वाला है। रिजवान के प्रोफाइल पर नजर दौडायें तो वर्ष 2017 में आतंकी गतिविधियों में उसकी संलिप्तता रही। विस्फोटक बरामदगी व संदिग्ध अंतर्राष्ट्रीय संपर्क की पुष्टि के पश्चात 6 साल जेल में बिताने के बाद वर्ष 2023 में रिजवान की रिहाई हुई और फिर पडरौना में फूड स्टॉल का संचालन, सामान्य जिंदगी का दिखावा और कथित तौर पर फिर संदिग्ध गतिविधियो मे संलिप्त होना यह वही पैटर्न है, जिसे सुरक्षा एजेंसियां “लो-प्रोफाइल स्लीपर सेल” कहती हैं। जहां संदिग्ध भीड़ में घुल-मिलकर घटना को अंजाम देते है,बिना किसी शोर-शराबा के।
पिता की जिम्मेदारी पर सवाल
रिजवान अहमद की गिरफ्तारी के बाद उसके पिता का मीडिया के कैमरा के सामने दिये बयान भी इस पूरे मामले में एक बहस का मुद्दा है। रिजवान के पिता के मुताबिक “अगर रिजवान दोषी है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।” साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि जेल से छूटने के बाद रिजवान उनके साथ ही घर पर रहता था।यह बयान जहां एक ओर कानून और देश के प्रति निष्ठा को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर कुछ गंभीर और असहज सवाल भी खड़ा कर रहा है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस बेटे का नाम पहले से ही आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन से जुड़ चुका हो, जिसने वर्षों जेल में बिताए हों उसकी रिहाई के बाद परिवार की जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए थी? क्या सिर्फ उसे घर में शरण देना पर्याप्त था, या उसकी गतिविधियों पर नजर रखना भी उतना ही जरूरी था? यहां सवाल “मंशा” का नहीं, बल्कि “सतर्कता” का है। रिजवान के पिता की देशभक्ति या नीयत पर संदेह करना उचित नहीं है, लेकिन यह जानना भी जरूरी है कि उन्होंने अपने बेटे रिजवान के अतीत की गंभीरता को उतनी ही गंभीरता से लिया, जितनी अपेक्षित थी?
🔵 रिपोर्ट - संजय चाणक्य

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