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सीएमओ ऑफिस बना ‘रोजगार एक्सचेंज’, डीएम की जांच में खुल गया भर्ती खेल

 

🔵सीएमओ ऑफिस में ‘नौकरी मंडी’ का खेल! कागजों में भर्ती, अस्पतालों में तैनाती... आउटसोर्सिंग के नाम पर नौकरी का खेल, 24 कर्मियों पर गिरी गाज

 🔴डीएम की जांच टीम ने किया फ्रंट लाइन सिक्योरिटी एंड मैन पावर सर्विसेज एजेंसी के खेल का खुलासा 

🔵 ग्लोबल न्यूज 

कुशीनगर। जनपद का स्वास्थ्य विभाग इन दिनों इलाज कम और “नौकरी बेचो अभियान” ज्यादा बन गया है। अस्पतालों में मरीज, स्ट्रेचर और दवाओ के लिए जूझते रहे, लेकिन सीएमओ दफ्तर में आउटसोर्सिंग के नाम पर नौकरी बांटने का ऐसा खेल चलता रहा, जिसमें नियमों को फाइलों के नीचे दबाकर 24 लोगों की तैनाती कर दी गई। अब जिलाधिकारी की जांच में जब परतें खुलीं तो पूरा सिस्टम कटघरे में आ गया। क्योंकि यह कोई साधारण गड़बड़ी नहीं, बल्कि सरकारी भर्ती प्रक्रिया को जेब में रखकर खेला गया पूरा  “सेटिंग कांड” बताया जा रहा है।

आरोप है कि फ्रंट लाइन सिक्योरिटी एंड मैन पावर सर्विसेज नामक एजेंसी के जरिए सफाईकर्मी और सपोर्ट स्टाफ की भर्ती में शासन की सभी गाइडलाइनो की धज्जियां उड़ाई गईं। जिस रेंडमाइजेशन प्रक्रिया को निष्पक्ष भर्ती की रीढ़ माना जाता है, उसे यहां ऐसे गायब कर दिया गया जैसे कभी नियम नाम की कोई चीज थी ही नहीं। सूत्र बताते हैं कि भर्ती का यह खेल उस वक्त खेला गया जब विभाग नेतृत्व के संकट से गुजर रहा था। तत्कालीन सीएमओ डॉ. अनुपम प्रकाश भास्कर के निधन के बाद डाॅ वृजनंदन कुमार को कार्यवाहक सीएमओ बनाया गया। इसी दरम्यान काम चलाऊ व्यवस्था के सहारे चल रहे स्वास्थ्य विभाग में “अस्थायी सत्ता” का फायदा उठाकर फाइलों में नौकरी का पूरा बाजार सजा दिया गया। बिना पारदर्शी चयन, बिना वैध प्रक्रिया और बिना ठोस प्रशासनिक स्वीकृति के सीधे लोगों को अस्पतालों में फिट कर दिया गया। मामले की भनक जब जिलाधिकारी तक पहुंची तो जांच समिति गठित हुई। मुख्य विकास अधिकारी वंदिता श्रीवास्तव की अध्यक्षता में गठित जांच टीम ने जब दस्तावेज खंगाले तो भर्ती प्रक्रिया की पूरी इमारत ही खोखली निकली। कहीं चयन प्रक्रिया अधूरी मिली, कहीं रिकॉर्ड गायब मिले, तो कहीं नियमों को जानबूझकर नजरअंदाज करने के संकेत मिले। जांच रिपोर्ट आते ही प्रशासन ने 24 कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दीं। लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि अगर भर्ती गलत थी तो एक साल तक वेतन किसके इशारे पर निकलता रहा? किसके संरक्षण में एजेंसी अस्पतालों में मनमानी तैनाती करती रही? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ कर्मचारियों को हटाकर इस “भर्ती कारोबार” पर पर्दा डाल दिया जाएगा?क्योंकि स्वास्थ्य विभाग का रिकॉर्ड भी कम दिलचस्प नहीं है। तीन महीने पहले भी इसी तरह 12 कर्मचारियों की छुट्टी की गई थी। यानी विभाग में आउटसोर्सिंग अब व्यवस्था नहीं, बल्कि “कमाई और कृपा” का ऐसा जरिया बन चुका है, जहां नौकरी योग्यता से कम और पहुंच से ज्यादा तय होती दिख रही है।

जिले में चर्चा है कि अगर डीएम जांच न बैठाते तो यह खेल अभी और लंबा चलता। फाइलों में नियम मरते रहते और अस्पतालों में “सेटिंग वाले कर्मचारी” ड्यूटी करते रहते। अब निगाह इस बात पर है कि कार्रवाई केवल नीचे स्तर  तक सीमित रहेगी या फिर उन अफसरों और एजेंसियों तक भी पहुंचेगी जिन्होंने सरकारी सिस्टम को निजी रोजगार केंद्र बनाकर रख दिया।

🔵 रिपोर्ट - संजय चाणक्य 

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