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आरओ प्लांट में लाखों का खेल, प्रधान-सचिव बेखौफ, प्रशासन खामोश

 

🔴मनीकौरा आरओ प्लांट: प्रशासन खामोश, आखिर किसके संरक्षण में चल रहा ‘पानी’ का खेल?

🔵लाखों रुपये के भुगतान पर उठे सवाल,

🔴प्रधान-सचिव के गैरजिम्मेदाराना बयान के बाद भी प्रशासनिक गलियारों में सन्नाटा

🔵 व्यूरो ग्लोबल न्यूज 

कुशीनगर। जनपद के विशुनपुरा विकास खण्ड के मनीकौरा गांव में 15वें वित्त आयोग से लगाए गये आरओ प्लांट में वित्तीय अनियमितता का मामला अब सिर्फ एक ग्राम पंचायत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे पंचायत राज तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा कर रहा है। हैरत की बात यह है कि अधूरे कार्य पर लाखों रुपये के भुगतान, निर्माण की गुणवत्ता पर गंभीर आरोप और जिम्मेदारों के गैरजिम्मेदाराना बयानों के सार्वजनिक होने के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है, जो कई सवाल को जन्म दे रहा है। 

बतादे कि बीते दिनो मीडिया ने प्रमुखता के साथ  यह उजागर किया  था कि करीब 4.50 लाख रुपये की परियोजना में 3.66 लाख रुपये से अधिक का भुगतान हो चुका है, जबकि कार्य उस समय तक अधूरा बताया जा रहा है। ग्रामीणों ने निर्माण सामग्री की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए थे। उम्मीद थी कि मामला सामने आने के बाद जिम्मेदार विभाग व प्रशासनिक अमला तत्काल संज्ञान लेंगे, लेकिन एक पखवाड़ा बीतने के बाद भी विभाग व प्रशासन की चुप्पी ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या सरकारी धन के बंदरबांट में सवाल पूछना गुनाह है? पूरे मामले में सबसे अधिक चर्चा उन बयानों की है, जो ग्राम प्रधान नंदलाल साहनी और ग्राम सचिव राजकिशोर राय ने सवाल पूछे जाने पर दिए थे। मीडिया ने जब प्रधान नंदलाल साहनी से पूछा था कि कार्य पूरा होने से पहले भुगतान कैसे हो गया, तो उनका जवाब था “अधिकारी पूछेंगे तो हम उनसे बात कर लेंगे।” यानी सवालों का जवाब नियम-कानून से नहीं, बल्कि "बात कर लेने" में तलाशा जा रहा है। दूसरी ओर ग्राम सचिव राजकिशोर राय ने तो पारदर्शिता की सारी सीमाएं लांघते हुए कथित तौर पर कहा “बजट से क्या मतलब, आप अपनी मंशा बताइए।” सवाल यह है कि गांव के विकास के लिए आए सरकारी धन का हिसाब पूछना यदि गलत है तो फिर सही क्या है? क्या पंचायतों में व्यय होने वाला धनराशि ग्राम प्रधान व सेक्रटरी के जेब से खर्च हो रहा है? क्या ग्राम पंचायत अब जवाबदेही से ऊपर हो चुकी है?

🔴खबर के बाद भी कार्रवाई नहीं, क्या सब कुछ ‘मैनेज’ है?

ग्रामीणों का कहना है कि यदि आरोप निराधार हैं तो प्रशासन जांच कराकर दूध का दूध और पानी का पानी स्पष्ट कर दे। लेकिन खबर  सामने आने के बाद भी जांच न होना लोगों के मन में संदेह पैदा कर रहा है। गांव में अब खुलकर चर्चा होने लगी है कि क्या मामले को दबा दिया गया?  क्या प्रधान व सचिव इतने प्रभावशाली है कि 15वें वित्त आयोग की योजनाओं में निर्माण कार्य पूर्ण होने से पहले भुगतान व धन का बंदरबांट कर मामले को रफा-दफा कर दिया। क्या प्रभाव और पहुंच के दम पर जांच को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है? क्योंकि सामान्य मामलों में छोटी शिकायतों पर भी जांच बैठ जाती है, लेकिन यहां लाखों रुपये के भुगतान पर सवाल उठने के बावजूद जिम्मेदार विभाग की चुप्पी समझ से परे है।

🔴 क्या कहते है नियम 

जानकारों की माने तो 15वे वित्त आयोग की योजनाओं में आम तौर पर कार्य पूर्ण होने के बाद तकनीकी सत्यापन, माप पुस्तिका (एमबी), जियो टैगिंग, फोटोग्राफी और अन्य प्रक्रियाएं पूरी की जाती हैं। इसके बाद भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।लेकिन मनीकौरा में अधूरे कार्य के बीच लाखों रुपये के भुगतान ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि यह रनिंग पेमेंट है तो उसकी स्वीकृति किस आधार पर दी गई? कितना कार्य पूर्ण माना गया? किस अधिकारी ने सत्यापन किया? इन सवालों के जवाब अभी तक सामने नहीं आए हैं।

🔴आरओ प्लांट सवालो के घेरे में 

जिस परियोजना का उद्देश्य ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना था, वह अब खुद सवालों के घेरे में खड़ी है। गांव के लोगों का कहना है कि आज तक उन्हें यह नहीं बताया गया कि कुल बजट कितना है, कितना भुगतान हुआ है और कार्य कब पूरा होगा।बडा सवाल यह है कि आखिर इतनी भुगतान की जल्दी क्या थी? किस अधिकारी ने कार्य का सत्यापन किया? कहना ना होगा कि किसी भी भ्रष्टाचार के आरोप में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका जांच और पारदर्शिता की होती है। लेकिन मनीकौरा प्रकरण में अब तक न तो किसी अधिकारी का बयान सामने आया और न ही किसी जांच की सूचना। यही कारण है कि लोगों के बीच यह धारणा मजबूत हो रही है कि कहीं न कहीं किसी स्तर पर मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है।

🔴 उठ रहे सवाल

मनीकौरा आरओ प्लांट घोटाला मे प्रधान और सचिव की भूमिका संदिग्ध प्रतीत हो रहा है। यही वजह है कि अधूरे कार्य पर लाखों रुपये का भुगतान किस आधार पर हुआ?भुगतान से पहले किसने गुणवत्ता और प्रगति का सत्यापन किया?प्रधान और सचिव के गैरजिम्मेदाराना बयानों को क्या अधिकारियों ने संज्ञान लिया? मीडिया द्वारा मामले को उजागर करने के बाद भी जांच क्यों नहीं शुरू हुई? जैसे तमाम सवाल यक्ष प्रश्न बना हुआ है।

🔵 रिपोर्ट - संजय चाणक्य 

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