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बुद्धा पार्क में करोड़ों का खेल! अधूरा काम, बकाया पेनाल्टी और धन का बंदरबांट पर सवाल

  

🔵ठेकेदार की लापरवाही सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज, फिर भी न वसूली हुई पेनाल्टी, न पूरा हुआ पार्क; डीपीआर तक नहीं दिखा सके जिम्मेदार अधिकारी

🔴डीपीआर छिपी, इंजीनियर गायब, पेनाल्टी बकाया: बुद्धा पार्क में बड़ा खेल

🔵ग्लोबल न्यूज 

कुशीनगर। बुद्धा पार्क में आखिर ऐसा क्या है जिसे छिपाने की कोशिश की जा रही है? ठेकेदार की लापरवाही सरकारी रिपोर्ट में दर्ज है, लगभग 25 लाख रुपये की पेनाल्टी निर्धारित हो चुकी है, जांच अधिकारी डीपीआर मांगते रहे लेकिन नहीं मिली, और परियोजना समयसीमा खत्म होने के बाद भी हस्तांतरित नही हुआ है तो सवाल लाजमी है कि जब सारी खामियां रिकॉर्ड पर हैं तो जिम्मेदार अधिकारी कार्रवाई की जगह चुप्पी साधे क्यो बैठे है? अखिर किसके इशारे पर कार्रवाई रुकी हुई है? यही वजह है कुशीनगर का बुद्धा पार्क अब विकास से ज्यादा व्यवस्था की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करने वाला मामला बनता जा रहा है।

जिला मुख्यालय स्थित करोड़ों रुपये की लागत वाले बुद्धा पार्क परियोजना का मामला अब ऐसे ही सवालों के भंवर में फंस गया है। सरकारी दस्तावेजों में दर्ज तथ्य यह संकेत दे रहे हैं कि कहीं अधूरे निर्माण, पेनाल्टी की अनदेखी और जांच में बरती गई ढिलाई के पीछे किसी बड़े खेल की पटकथा तो नहीं लिखी गई है।

🔴सरकारी रिकॉर्ड ने खोली पोल, ठेकेदार की लापरवाही पर विभाग की मुहर

आईजीआरएस जांच में जिला उद्यान अधिकारी और प्रांतीय खंड कसया के अवर अभियंता द्वारा  संयुक्त आख्या में साफ कहा गया है कि बुद्धा पार्क का निर्माण कार्य 15 सितंबर 2025 तक पूरा होकर उद्यान विभाग को हस्तांतरित हो जाना चाहिए था। लेकिन समयसीमा खत्म होने के कई महीने बाद भी पार्क अधूरा पड़ा रहा।रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया कि एमओयू की शर्तों के अनुसार कार्यदायी संस्था शुभम कान्सट्रक्शन एंड कान्सल्टेन्सी पर 24.98 लाख रुपये की पेनाल्टी निर्धारित की जा  चुकी है। वहीं यूपीआरएनएसएस के अधिशासी अभियंता ने भी अपने पत्र में माना है कि ठेकेदार कार्य में रुचि नहीं ले रहा था और बार-बार निर्देश देने के बावजूद निर्माण कार्य की रफ्तार बेहद सुस्त रही, जब सरकारी दस्तावेज स्वयं ठेकेदार की नाकामी की गवाही दे रहे हैं, तब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर लगभग 25 लाख रुपये की पेनाल्टी की वसूली आज तक क्यों नहीं की गयी?

🔴25 लाख की पेनाल्टी पर किसका पहरा?

कहना ना होगा ठेकेदार द्वारा लापरवाही बरतने व निर्माण कार्य मे रुचि न लेने के कारण समयसीमा की भीतर कार्य पूरा नही होने पर शुभम शुभम कान्सट्रक्शन एंड कान्सल्टेन्सी संस्था पर फरवरी 2026 तक लगभग 25 लाख रुपये की पेनाल्टी बन चुकी थी। मार्च से जून तक हुई अतिरिक्त देरी का हिसाब अलग है। यानी पेनाल्टी की रकम और बढ़ चुकी होगी। लेकिन हैरत की बात यह है कि न वसूली हुई और न ही किसी जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई का कोई रिकॉर्ड सामने आया।नियम कहते हैं कि समयसीमा तोड़ने वाले ठेकेदार पर आर्थिक दंड लगाया जाए ताकि जनता के धन की क्षति की भरपाई हो सके। लेकिन बुद्धा पार्क में ऐसा लगता है कि नियमों को फाइलों में बंद कर दिया गया और ठेकेदार को खुली राहत दे दी जा रही है।यही वह बिंदु है जहां भ्रष्टाचार और संरक्षणवाद की आशंका जन्म लेती है।

🔴डीपीआर मांगते रहे जांच अधिकारी, जिम्मेदार देते रहे ‘तारीख पर तारीख’

मामले का सबसे विस्फोटक पहलू आईजीआरएस जांच के दौरान सामने आया। जिला उद्यान अधिकारी की रिपोर्ट के अनुसार निरीक्षण के समय न तो आवश्यक अभिलेख उपलब्ध थे और न ही निर्माण कार्य के जिम्मेदार इंजीनियर मौके पर मौजूद थे। फोन पर संपर्क करने पर पहले एक तारीख दी गई, फिर दूसरी और फिर तीसरी। लेकिन डीपीआर नहीं मिली। मतलब यह कि जांच अधिकारियों को न दस्तावेज मिला और न ही तारीख पे तारीख देने वाले जिम्मेदार अधिकारी मिले।आखिरकार जांच अधिकारी को बिना डीपीआर के ही निर्माण स्थल का निरीक्षण कर अपनी रिपोर्ट पोर्टल पर अपलोड करनी पड़ी।सवाल यह है कि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है तो डीपीआर दिखाने से परहेज क्यों किया गया? क्या डीपीआर और धरातल पर हुए निर्माण में कोई ऐसा अंतर है जिसे छिपाने की कोशिश की जा रही थी?क्योंकि किसी भी निर्माण परियोजना की डीपीआर उसका तकनीकी संविधान होता है। उसी से तय होता है कि कितना पैसा कहां खर्च होगा, कौन-सी सामग्री लगेगी और निर्माण किस मानक पर होगा। जब यही दस्तावेज जांच अधिकारी को नहीं दिखाया गया तो संदेह स्वाभाविक है।

🔵अवर अभियंता की निगरानी पर भी उठे सवाल

निर्माण स्थल पर तैनात अवर अभियंता की जिम्मेदारी केवल माप पुस्तिका भरने तक सीमित नहीं होती। उसे निर्माण की गुणवत्ता, प्रगति, तकनीकी मानकों और दस्तावेजों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होती है।ऐसे में सवाल उठना लाजमी हैं कि जब ठेकेदार महीनों तक काम में रुचि नहीं ले रहा था तब अवर अभियंता क्या कर रहे थे? क्या उन्होंने उच्चाधिकारियों को वास्तविक स्थिति से अवगत कराया?क्या उन्होंने ठेकेदार के खिलाफ कठोर कार्रवाई की संस्तुति की?क्या उन्होंने निर्माण की धीमी गति को लेकर लगातार रिपोर्ट भेजी? यदि भेजी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?और यदि नहीं भेजी तो क्या निगरानी तंत्र ने जानबूझकर आंखें मूंद ली थीं?

🔴धन का बंदरबांट, अधूरा पार्क, सुरक्षित ठेकेदार 

सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद जनता को आज तक पूरी तरह विकसित बुद्धा पार्क नहीं मिल सका। परियोजना अब भी हस्तांतरण की प्रतीक्षा में है।दूसरी तरफ निर्माण कार्य में भ्रष्टाचार, अनियमितता व धन का बंदरबांट के आरोपों की जांच अधूरी है। ठेकेदार की लापरवाही के कारण निर्माण कार्य में हुए बिलंब के बाद पेनाल्टी की वसूली नहीं हुई है और जिन अधिकारियों पर निगरानी की जिम्मेदारी थी, उनकी भूमिका भी सवालों के घेरे में है। सबब यह है कि जिला मुख्यालय के सबसे संवेदनशील इलाके में स्थित इस परियोजना में यदि जांच अधिकारियों को डीपीआर तक न मिले, इंजीनियर निरीक्षण से गायब रहें, ठेकेदार की लापरवाही सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हो और फिर भी कार्रवाई न हो, तो इसे महज प्रशासनिक चूक कहना वास्तविकता से आंख चुराने जैसा होगा।

🔵 रिपोर्ट - संजय चाणक्य 

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