🔵पुराने पौधों का हिसाब नहीं, नया लक्ष्य लेकर मैदान में वन विभाग
🔴ग्लोबल न्यूज
कुशीनगर। जनपद में एक बार फिर वृक्षारोपण महाभियान का शंखनाद हो चुका है। सरकारी विभागों को लक्ष्य बांट दिए गए हैं, गड्ढे खोदे जा रहे हैं, पौधशालाओं से पौधे निकलने लगे हैं और कुछ ही दिनों में 45 लाख 17 हजार पौधे लगाने का दावा भी पूरा कर लिया जाएगा। लेकिन इस बार माहौल पहले जैसा नहीं है। सबब यह है आम जनमानस इस बार पौधे लगाने की संख्या नहीं, बल्कि पुराने पौधों का हिसाब मांग रही है।
बतादे कि , पिछले कई दिनों से मीडिया लगातार वन विभाग के पौधरोपण अभियानों की परतें खोल रहा है। पहले 39 लाख पौधों के दावे पर सवाल उठे, फिर "जंगल" नाम वाले गांवों में हरियाली गायब होने की हकीकत सामने आई और अब नए लक्ष्य के साथ पुराना सवाल और बड़ा हो गया है जब पिछले तीन वर्षों में 1 करोड़ 20 लाख से अधिक पौधे लगाए जा चुके हैं, तो फिर कुशीनगर में हरियाली दिखाई क्यों नहीं देती? आखिर यह कैसा वृक्षारोपण अभियान है, जिसमें हर वर्ष वन विभाग द्वारा लाखों पौधे लगाए जाने का दावा किया जाता है, लेकिन जिले की तस्वीर बदलती नजर नहीं आती है। सवाल यह है कि यदि इतने पौधे वास्तव में धरती पर मौजूद हैं, तो कुशीनगर की पहचान आज भी हरियाली के बजाय धूल, खाली जमीन और कटते पेड़ों से क्यों हो रही है?
🔴 पुराने पौधे गायब, नए लक्ष्य तैयार
सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में 37.42 लाख और वर्ष 2025 में 39.72 लाख पौधे लगाए गए। अब वर्ष 2026 में 45.17 लाख पौधों का लक्ष्य निर्धारित कर दिया गया है। यानी तीन वर्षों में कुल आंकड़ा 1 करोड़ 20 लाख पौधों से ऊपर पहुंच चुका है।लेकिन जिले के गांवों, सड़कों, नहरों, ग्राम समाज की जमीनों और सार्वजनिक स्थलों पर नजर डालिए, कहीं भी करोड़ों पौधों की मौजूदगी का अहसास नहीं होता। हालात यह हैं कि जंगल बेलवा, जंगल खिरकिया, जंगल जगदीशपुर, जंगल अमवा और जंगल पिपरासी जैसे गांव तक हरियाली के लिए तरस रहे हैं।
🔴पौधे की मौत के लिए जिम्मेदार कौन?
हर साल जुलाई आते ही विभागों में लक्ष्य बांटे जाते हैं। फोटो खिंचती है, प्रेस विज्ञप्तियां जारी होती हैं, पौधरोपण महोत्सव मनाया जाता है और फिर सब कुछ शांत हो जाता है। लेकिन कभी किसी विभाग ने यह बताने की जहमत नही उठाई कि पिछले वर्ष लगाए गए पौधों में से कितने जीवित हैं? कितने पेड़ बन गए? कितने सूख गए? और कितनों पौधे की मौत के लिए जिम्मेदार कौन है? हैरानी की बात यह है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद पौधों की मृत्यु पर कोई जवाबदेही तय नहीं होती। यदि किसी निर्माण कार्य में सरकारी धन खर्च होने के बाद वह नष्ट हो जाए तो जांच बैठती है, कार्रवाई होती है। लेकिन लाखों पौधे सूख जाने के बाद भी कोई जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता।
🔴सर्वाइवल रेट सार्वजनिक करने से डर क्यों?
वन विभाग हर साल यह बताता है कि कितने पौधे लगाए गए, लेकिन यह नहीं बताता कि कितने बचे। आखिर क्यों?क्या विभाग के पास सर्वाइवल रेट का आंकड़ा नहीं है?यदि आंकड़ा है तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता ? यदि सर्वाइवल रेट संतोषजनक है तो फिर जनता को यह जानकारी देने में हिचकिचाहट क्यों?यह वह सवाल है जो पूरे वृक्षारोपण अभियान की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है।
🔴 डीएफओ साहब! इन सवालों का कौन देगा जवाब ?
डीएफओ साहब! पिछले तीन वर्षों में लगाए गए पौधों में से कितने पौधे आज जीवित हैं?कितने पौधे पेड़ बन चुके हैं?पौधों के संरक्षण पर कितना धन खर्च हुआ?कितने स्थानों का भौतिक सत्यापन कराया गया?सूख चुके पौधों की जिम्मेदारी किसकी तय हुई?क्या इस वर्ष भी सिर्फ लक्ष्य पूरा कर फाइल बंद कर दी जाएगी?अगर पौधे जीवित हैं तो दिखाई क्यों नहीं देते?और यदि जीवित नहीं हैं, तो हर साल करोड़ों रुपये खर्च कर आखिर किसका लक्ष्य पूरा किया जा रहा है पर्यावरण का या फिर खुद को करोडपति बनने का? ऐसे तमाम सवाल है जो सुरसा की तरह मुंह बाये खडी है जिसका जबाब जितना देर से आएगा, संदेह उतना गहराता जाएगा।
🔴 रिपोर्ट - संजय चाणक्य

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